
रायपुर/सुकमा। सुकमा जिले के पकोला पोटोकबिन आश्रम स्कूल में घटित फिनाइल कांड अब बड़ा प्रशासनिक सवाल बन चुका है। जांच में खुलासा हुआ है कि बच्चों ने घटना के अगले ही दिन आरोपी शिक्षक का नाम अधिकारियों को बता दिया था। बावजूद इसके, मामले को चार दिनों तक दबाकर रखा गया। इस दौरान न तो आरोपी के खिलाफ तुरंत एक्शन लिया गया और न ही बच्चों व अभिभावकों को पूरी जानकारी दी गई।क्या है पूरा मामला?21 अगस्त की रात पकोला पोटोकबिन आश्रम के हॉस्टल में फिनाइल पिलाए जाने की घटना सामने आई। बच्चों की तबीयत बिगड़ी और हड़कंप मच गया। 22 अगस्त को जब जांच टीम स्कूल पहुंची, तब बच्चों ने आरोपी शिक्षक का नाम साफ-साफ बता दिया।लेकिन अधिकारियों ने “माहौल बिगड़ने” और “बच्चों पर दबाव न बने” का हवाला देकर रिपोर्ट तैयार करने में चार दिन का समय लगा दिया। 25 अगस्त को मामला सार्वजनिक हुआ और कार्रवाई की औपचारिक शुरुआत हुई।बच्चों की गवाही पहले ही मिल चुकी थीबच्चों ने अधिकारियों को यह बताते हुए आरोपी शिक्षक का नाम उजागर किया कि उन्हीं ने जबरन फिनाइल पिलाने की कोशिश की थी। डीईओ और अन्य अधिकारी खुद स्कूल पहुंचे थे और घटनास्थल पर मौजूद बच्चों ने पूरी कहानी सुना दी थी।15 अधिकारी-कर्मचारी जिम्मेदार ठहराए गएबीईओ-डीईओ समेत 15 अफसरों और कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।आरोपी शिक्षक को निलंबित कर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।उच्चाधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि इतने गंभीर मामले को इतने दिन तक दबाए रखना बड़ी लापरवाही है।डीईओ की सफाईडीईओ ने कहा कि बच्चों से सीधे बातचीत करने पर माहौल बिगड़ने और भय का वातावरण बनने की आशंका थी। इसलिए जांच को गोपनीय रखा गया और प्रशासनिक स्तर पर रिपोर्ट तैयार की गई। उल्लेखनीय है कि बच्चों की आपबीती पकोला पोटोकबिन आश्रम में कक्षा 5वीं से 10वीं तक कुल 351 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। घटना की रात छात्रों में अफरा-तफरी मच गई। बताया गया कि आरोपी शिक्षक ने जबरन फिनाइल पिलाने की कोशिश की, जिससे कई बच्चे डर गए और बीमार पड़ गए।
प्रशासन ने देर से ही सही, कार्रवाई शुरू कर दी है। आरोपी शिक्षक जेल भेज दिया गया है और 15 अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार लटक रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ नोटिस और निलंबन ही काफी है, या फिर इतनी बड़ी लापरवाही पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए?
यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, प्रशासन की संवेदनशीलता और सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।








